Khakee The Bengal Chapter Review: सियासत की सरपरस्ती में फल-फूल रही जुर्म की दुनिया पर खाकी की ‘जीत’ का दांव

Khakee The Bengal Chapter Review. Photo- Instagram

मनोज वशिष्ठ, मुंबई। Khakee The Bengal Chapter Review: 2014 में अली अब्बास जफर गुंडे लेकर आये थे, जिसमें सत्तर-अस्सी के दशक के सिटी ऑफ जॉय कोलकाता में दो जिगरी यारों के अपराध जगत में सफलता की सीढ़ियां चढ़ने और एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बनने की कहानी दिखाई गई थी।

कुछ ऐसे ही कैनवास पर लिखी गई है नीरज पांडेय की वेब सीरीज खाकी- द बंगाल चैप्टर की कहानी, जो 2002 के आसपास के कोलकाता में स्थापित की गई है। हालांकि, कहानी का प्रसार और सीरीज का ट्रीटमेंट गुंडे से अलग रखा गया है।

खाकी- द बंगाल चैप्टर सियासत और अपराध के गठजोड़ को प्रमुख रूप से दिखाती है। सत्ता में बने रहने की हवस नेताओं को अपराध से जोड़ती है तो पुलिस के कहर से बचने की मजबूरी गैंगस्टरों को नेताओं की चौखट तक ले जाती है।

नीरज ने खाकी के बंगाल चैप्टर में बंगाली सिनेमा के कई चर्चित चेहरों को प्रमुख किरदारों में लिया है। सीरीज के हीरो जीत बंगाली फिल्मों के एक्शन स्टार हैं तो विलेन प्रोसेनजीत चटर्जी की गिनती दिग्गज सितारों में की जाती है। जीत का यह ओटीटी (और हिंदी) डेब्यू भी है। सीरीज के निर्देशन की जिम्मेदारी देबात्मा मंडल ने उठाई है।

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क्या है खाकी- द बंगाल चैप्टर की कहानी?

पश्चिम बंगाल में चुनाव की आहट हो चुकी है। कोलकाता में अपराधों का बोलबाला आगामी चुनावों में बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसलिए, इस पर लगाम कसने की तैयारी शुरू होती है।

सफाई के लिए आइपीएस सप्तर्षि सिन्हा (परमब्रत) को बुलाया जाता है, मगर गैंगस्टर बाघा (शाश्वत चटर्जी) के दो प्रमुख सहयोगी सागर तालुकदार (रित्विक भौमिक) और रंजीत ठाकुर (आदिल जफर खान) सप्तर्षि की हत्या कर देते हैं।

आइपीएस अफसर की हत्या से हाहाकार मच जाता है। विपक्ष इस मुद्दे को जोरशोर से उठा लेता है। हालात को काबू में करने के लिए तेजतर्रार आइपीएस अर्जुन मैत्रा (जीत) को एसआइटी की कमान सौंपी जाती है।

अर्जुन अपने हिसाब से काम करने वाला अफसर है और जब उसका हिसाब सत्ता के गणित पर भारी पड़ने लगता है तो उसे भी साइडलाइन कर दिया जाता है, मगर अर्जुन टीम से बाहर होने के बाद ऐसा गेम खेलता है, जिसमें गैंगस्टरों के सफाये के साथ सियासी गठजोड़ की भी सफाई हो जाती है।

कैसा है सीरीज का स्क्रीनप्ले?

खाकी- द बंगाल चैप्टर की कहानी को 7 एपिसोड्स में फैलाया गया है। सीरीज की शुरुआत गैंगस्टर बाघा के साथ होती है, जो बचपन में ही अपराध की दुनिया में उतर गया था। बाघा भले ही गैंगस्टर है, मगर अपने इलाके में उसका पूरा सम्मान है।

बाघा की डोर सत्तारूढ़ पार्टी के ताकतवर नेता बरुण रॉय के हाथ में है। सागर और रंजीत बाघा के सबसे वफादार हैं और उसके आपराधिक साम्राज्य की देखभाल करते हैं। सागर और रंजीत, गहरे दोस्त हैं। रंजीत को बाघा के पास सागर ही लेकर जाता है। सागर शातिर है।

कब दिमाग को ठंडा या गर्म करना है, उसे पता है। रंजीत का अपने गुस्से पर कोई काबू नहीं है। विपरीत स्वभाव का होने के बावजूद दोनों में खूब बनती है।

सागर की पत्नी मंजुला को भाभी और बहन मानता है। सीरीज मुख्य रूप से इन्हीं किरदारों की दोस्ती, दुश्मनी और पुलिस एक्शन के बीच घूमती है।

सियासी उठापटक के दृश्य उतने ही हैं, जितने मुख्य कथानक को सपोर्ट करते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री शीर्षेंदु दास सिर्फ नाम के लिए हैं, मगर मुश्किल फैसलों का समाधान बरुण रॉय के हाथों में है।

विपक्ष की नेता निबेदिता बशाक के जरिए पश्चिम बंगाल की सियासत में महिलाओं की सशक्त मौजूदगी दर्शाई गई है।

नीरज पांडेय ने अपने सभी किरदारों को उभरने दिया है। नेगेटिव किरदार खुलकर सामने आये हैं। इसके लिए हिंसक दृश्यों का इस्तेमाल जमकर किया गया है।

अपराध को सियासी संरक्षण मिलने के बावजूद पुलिस का पक्ष मजबूत दिखाया गया है। कहीं से भी सीरीज में ऐसा नहीं लगता कि खलनायक पुलिस पर भारी है। डीसीपी अर्जुन मैत्रा के जरिए पुलिस के एक कदम आगे ही रखा गया है, जो विलेन की साजिशों का ना सिर्फ उसी के अंदाज में जवाब देता है, बल्कि वक्त आने पर खुद प्लॉटिंग भी करता है।

कुछ दृश्य अप्रत्याशित हैं और उत्सुकता बनाये रखते हैं। रंजीत द्वारा करवाये गये बम धमाके में सागर की पत्नी मंजुला की मौत, रंजीत के हाथों सागर की मौत का दृश्य अप्रत्याशित हैं और चौंकाते हैं।

इनकी दोस्ती को जितनी शिद्दत से दिखाया गया है, दुश्मनी को भी उसी गंभीरता से पेश किया है।

संवाद किरदारों के अनुरूप बंगाली और हिंदी में हैं। तकरीबन 40-60 फीसदी का अनुपात है। हिंदी दर्शकों को सबटाइल से समझना होगा। बंगाली भाषा में संवाद रखने से दृश्यों में एक प्रवाह बना रहता है।

सीरीज का क्लाइमैक्स कुछ खिंचा हुआ लगता है। सम्भवत: जीत की ऑनस्क्रीन इमेज को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया गया है।

कैसा है कलाकारों का अभिनय?

सीरीज का सबसे सबल पक्ष कलाकार ही हैं। नीरज ने बंगाली सिनेमा के बेहतरीन कलाकारों को सीरीज में लिया है। भले ही उनके किरदारों की लम्बाई अधिक नहीं है। बाघा के किरदार शाश्वत चटर्जी का किरदार ज्यादा लम्बा नहीं है। परमब्रत चटर्जी डीसीपी सिन्हा के किरदार में कुछ देर के लिए आते हैं।

प्रोसेनजीत चटर्जी ने शातिर और मंझे हुए राजनेता बरुण रॉय के किरदार में जान फूंक दी है। जिस तरह वो भाव बदलते हैं, वो उनके बेहतरीन कलाकार होने की मिसाल है।

एक दृश्य में जब वो गुस्से में मेज पर हाथ मारकर कांच तोड़ देते हैं। अंदर से पत्नी की आवाज आती है तो अगले ही पल नरम आवाज में वो जवाब देते हैं, यह दृश्य प्रोसेनजीत के अभिनय का नमूना है।

बंदिश बैंडिट्स सीरीज से चर्चित हुए कलाकार रित्विक भौमिक को निर्दयी गैंगस्टर के किरदार में पेश करने का दांव सफल रहा। शिकारा फेम आदिल जफर खान ने रंजीत के पागलपन को कामयाबी के साथ पेश किया है।

डीसीपी अर्जुन के किरदार में जीत अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं। दिग्गज कलाकारों के बीच उनकी उपस्थिति नजर आती है। ईमानदार और तेज दिमाग पुलिस अफसर के किरदार को वो जस्टिफाई करते हैं।

विपक्षी नेता निबेदिता बशाक के किरदार में चित्रांगदा सिंह को ज्यादा मौका नहीं मिला, मगर अपने दृश्यों में वो छाप छोड़ती हैं। महाक्षय चक्रवर्ती लम्बे अर्से बाद नजर आये हैं। उनका किरदार कथ्य के लिए अहम है।

खाकी- द बंगाल चैप्टर असाधारण सीरीज नहीं है, मगर रोचक और मनोरंजक है। अनुराग बसु की फिल्म जग्गा जासूस की लेखन टीम से जुड़े रहे देबात्मा मंडल ओटीटी के लिए कई सीरीज कर चुके हैं। खाकी- द बंगाल चैप्टर में उनका निर्देशन निखरकर सामने आता है।

वेब सीरीज: खाकी- द बंगाल चैप्टर

कलाकार: प्रोसेनजीत चटर्जी, जीत, रित्वक भौमिक, आदिल जफर खान, चित्रांगदा सिंह, शाश्वत चटर्जी, परमब्रत चटर्जी, शुभाशीष मुखर्जी, महाक्षय चक्रवर्ती, श्रद्धा दास, जॉय सेन गुप्ता, पूजा चोपड़ा, आकांक्षा सिंह आदि।

निर्देशक: देबात्मा मंडल

क्रिएटर: नीरज पांडेय

प्लेटफॉर्म: नेटफ्लिक्स

अवधि: लगभग 50 मिनट प्रति एपिसोड

स्टार: *** (तीन)