Review: ‘खूबसूरत’ है वो इतना सहा नहीं जाता!

Khoobsurat Sonam and Fawadफ़िल्म- खूबसूरत, जॉनर- रोमांटिक-कॉमेडी ड्रामा

एक्टर्स- सोनम कपूर, फ़वाद ख़ान, रत्ना पाठक, किरण खेर, आमिर रज़ा हुसैन।

डायरेक्टर- शशांक घोष

प्रोड्यूसर- रिया कपूर, अनिल कपूर और सिद्धार्थ रॉय कपूर।

बैनर- अनिल कपूर फ़िल्म्स कंपनी, वॉल्ट डिज़्नी पिक्चर्स।

स्टार्स: **/5     

सोनम कपूर की लेटेस्ट रिलीज़ फ़िल्म ‘खूबसूरत’ को देखते हुए पता नहीं क्यों मेरे ज़हन में एक ही गाना गूंज रहा था- ‘खूबसूरत’ है वो इतना सहा नहीं जाता। फ़िल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, इस गाने के लिए मेरा रोग बढ़ता जा रहा था। दरअसल, ये सारा कुसूर फ़िल्म के टाइटल का है, और फ़िल्म देखने के बाद यह अहसास हुआ, कि इसी गाने को ‘खूबसूरत’ का टाइटल ट्रैक बनाना चाहिए था। वाकई वो इतना ज़्यादा ख़ूबसूरत हो गया है, कि उसे बर्दाश्त करना भी मुश्किल है। ख़ैर, जो हो गया, सो हो गया, फिलहाल में बताता हूं, कि ‘खूबसूरत’ में क्या है बदसूरत। 

कहानी:

फ़िल्म की कहानी अस्सी के दशक में आई रेखा की फ़िल्म ‘खूबसूरत’ पर आधारित है। बस कहानी की बैकग्राउंड और क़िरदार के स्केच बदल दिए गए हैं। कहानी मिडिल क्लास फैमिली से उठाकर रॉयल फैमिली में शिफ़्ट कर दी गई है। पेशे से डॉक्टर मिली चक्रवर्ती (सोनम कपूर) एक फिजियोथिरेपिस्ट है, लेकिन पैशन से वो एक केयरलेस फैशनिस्टा है। मिली को संभलगढ़ के राजा (आमिर रज़ा हुसैन) की फिजियोथिरेपी करने का एसाइनमेंट मिलता है, क्योंकि राजा साहब सिंहासन छोड़कर एक व्हील चेयर पर विराजमान हो गए हैं। मिली को इन्हें व्हील चेयर से उठाकर वापस सिंहासन पर बिठाने की ज़िम्मेदारी दी जाती है। राजा साब की फिजियोथिरेपी करते-करते मिली को राजकुमार विक्रमादित्य राठौर (फ़वाद ख़ान) से प्यार हो जाता है, पर डॉ. मिली के रंग-ढंग और सलीका उसे रॉयल फैमिली में मिस फिट बनाता है। ख़ासकर रानी साहिबा निर्मला देवी राठौर (रत्ना पाठक शाह) की नज़र में, जो बेहद अनुशासित हैं, और रॉयल वैल्यूज़ को तरजीह देती हैं। फ़िल्म रानी साहिबा और डॉ. मिली के वैचारिक टकराव की कहानी है।

क़िरदार:

सोनम कपूर एक अल्हड़, मस्त, बातूनी, दुनिया से बेपरवाह लड़की के करेक्टर में फिट होने की कोशिश करती हुई नज़र आती हैं, और इसी कोशिश में कहीं-कहीं मिसफिट हो जाती हैं। सोनम के क़िरदार में उनकी पहले की फ़िल्मों के शेड्स नज़र आते हैं। पाकिस्तान से आए फ़वाद ख़ान की ये पहली फ़िल्म है, और उन्होंने एक अनुशासित, हैंडसम रॉयल प्रिंस के क़िरदार को जस्टिफाई किया है। रत्ना पाठक शाह बेहतरीन एक्टर हैं, लेकिन फ़िल्म में वो वैसा असर पैदा नहीं कर सकीं, जो ओरिजिनल में उनकी मां दीना पाठक ने किया था। हालांकि इसके लिए फ़िल्म की लेखक इंदिरा बिष्ट ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं। सोनम की लाउड मां के रोल में किरण खेर फिट हैं। हालांकि, वो ऐसे क़िरदार कई दफ़ा निभा चुकी हैं, सो कुछ अलग महसूस नहीं होता। रही बात राजा साहब बने आमिर रज़ा हुसैन की, तो उनके हिस्से में व्हली चेयर पर बैठने के सिवा ज़्यादा कुछ नहीं आया है, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया है।

निर्देशन:

‘ख़ूबसूरत’ को शशांक घोष को डायरेक्ट किया है। फ़िल्म की एक प्रोमोशनल इवेंट में शशांक ने साफ़ कर दिया था, कि उनकी फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी की ‘खूबसूरत’ से काफी अलग है। दरअसल, ये ऐलान करके उन्होंने ठीक ही किया है। सोनम के क़िरदार को उभारने और फ़िल्म को विजुअली खूबसूरत बाने के चक्कर में शशांक ने बाक़ी चीज़ों पर कम ध्यान दिया है।

निष्कर्ष:

इस ख़ूबसूरत में सिर्फ़ दो चीज़ें ख़ूबसूरत हैं- फ़वाद ख़ान और स्नेहा खानवल्कर का संगीत। जिसके लिए फ़िल्म को दो स्टार दिए जा सकते हैं।

(By- Kumar Manoj, sincerelycinema@gmail.com)

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