सेंसर बोर्ड बनाम सरकार: ताबूत में आख़िरी कील साबित हुई ‘एमएसजी’

फ़िल्म के एक सीन में संत गुरमीत राम रहीम सिंह इंसान
फ़िल्म के एक सीन में संत गुरमीत राम रहीम सिंह इंसान
मुंबई: हिंदी सिनेमा के इतिहास में संभवतया ये पहली बार है, जब किसी फ़िल्म को लेकर सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) और केंद्र सरकार में आमने-सामने की जंग शुरू हो गई हो।
100 साल से ज़्यादा के सफ़र में कई फ़िल्में ऐसी आई हैं, जिनकी रिलीज़ पर बोर्ड ने पाबंदी लगाई है, मगर ये पाबंदियां ज़्यादातर सरकार के इशारे पर लगाई जाती रही हैं। डेरा सच्चा सौदा के मुखिया संत गुरमीत राम रहीम सिंह इंसान की डेब्यू फ़िल्म एमएमजी- द मैसेंजर ऑफ़ गॉड  के मामले में सेंसर बोर्ड और सरकार लाइन के दोनों तरफ हो गए हैं।
शुक्रवार को  बोर्ड की अध्यक्ष लीला सैमसन के इस्तीफ़े के बाद सीबीएफसी के 8 और मेंबर्स इस्तीफ़ा दे रहे हैं। इनमें इरा भास्कर (एकेडमिक), पंकज शर्मा (एआईसीसी सचिव-हिंदी डिपार्टमेंट), राजीव मसंद (टीवी जर्नलिस्ट), अरूंधति नाग (एक्टर), शाहजी करूण (फ़िल्ममेकर), एमके रैना (थिएटर पर्सनैलिटी), निखिल अल्वा और लोरा के प्रभु (टीवी प्रोड्यूसर) शामिल हैं।
इन सभी सदस्यों का कार्यकाल पिछले साल मई में पूरा हो चुका है, जिसे बढ़ा दिया गया था। सेंसर बोर्ड सूत्रों की मानें, तो सरकार और बोर्ड के बीच खींचतान काफी अर्से से चल रही थी, लेकिन एमएसजी पर फ़िल्म सर्टिफिकेशन एपेलेट ट्रिब्यूनल के फ़ैसले ने ताबूत में आख़िरी कील का काम किया। सदस्यों को अपनी मौजूदगी ग़ैरज़रूरी लगने लगी, लिहाज़ा इस्तीफ़ा देने का निर्णय लिया गया।

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