‘धूम-3’ के ‘शोले छाप’ रिव्यूज़, ‘मौसी’ बने दर्शक

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मुंबई : ‘कूद जाऊंगा… मर जाऊंगा…’

वीरू टंकी पर चढ़ा हुआ है। गांव वाले नीचे खड़े होकर उसे मनाने की कोशिश कर रहे हैं। उधर, जय मौसी के सामने बैठकर वीरू की तारीफ़ों के पुल बांध रहा है। वीरू का ‘बायोडाटा’ सुनने के बाद मौसी के मुंह से यही निकलता है – वाह बेटा सच्चे दोस्त हो तुम। तुम्हारे दोस्त में लाख बुराइयां सही, लेकिन मुंह से तारीफ़ ही निकलती है।

शोले का ये मज़ेदार सीन अचानक ज़हन में आ गया, जब ‘धूम-3’ के कुछ रिव्यूज़ पढ़े, और वीरू की जगह ‘धूम-3’ को रखकर मैं ‘शोले’ की यादों में खो गया।

दोस्ती का फ़र्ज़ निभाते हुए जय वीरू के लिए बसंती का हाथ मांगने मौसी के पास जाता है, और वहां मौसी के सामने वीरू की कारगुजारियों का कच्चा चिट्ठा खोलता है, लेकिन इस तरह कि मौसी के सामने वीरू की ‘इज़्ज़त’ ख़राब ना हो। आख़िर दोस्ती का फ़र्ज़ जो निभाना है।

जय की यही अदा दिखाई कुछ क्रिटिक्स ने ‘धूम-3’ का रिव्यू लिखने में। बेहद संजीदगी के साथ उन्होंने शोले के जय (‘धूम-3’ का जय नहीं) का क़िरदार निभाया। ‘धूम-3’ की कमियां तो गिनाईं, जिनमें से कुछ नीचे दी गई हैं –

 

* फ़िल्म बहुत लंबी है- 2 घंटा 53 मिनट तक़रीबन, लेकिन आप झेल सकते हैं। 

* आमिर ख़ान और कटरीना कैफ़ के बीच कैमिस्ट्री ठंडी है, लेकिन संगीत ने इसे ढक दिया है।

* आमिर-कटरीना के कुछ गाने फ़िल्म की रफ़्तार को रोकते हैं, लेकिन कटरीना सुंदर लगी हैं।  

* फ़िल्म के कुछ सींस अलग-अलग अंग्रेजी फ़िल्मों से इंस्पायर्ड लगते हैं, लेकिन उनमें ओरिजिनैलिटी भी है।  

* अभिषेक बच्चन पुलिस ऑफ़िसर जैसे बिल्कुल नहीं दिखते, लेकिन कोशिश करते रहे। 

* ‘धूम-3’ आमिर की यादगार फ़िल्म नहीं कही जाएगी, लेकिन उन्होंने कमाल का काम किया है। … आदि-आदि।

 

फिर भी ‘वीरू’ में कोई बुराई नहीं है। तमाम ख़ामियां गिनवाकर उसे बैलेंस भी किया गया, ताकि फ़िल्म की इज़्ज़त ख़राब ना हो, इसके लिए रिव्यू के अंत में पांच में से चार और साढ़े चार स्टार दे दिए।

‘धूम-3’ के ये ‘शोले छाप’ रिव्यू पढ़कर मेरी हालत भी मौसी जी जैसी हो गई। अपने सिर पर हाथ रखकर कुछ देर के लिए मैं विचार शून्य बैठा रहा। माथा भन्ना गया था, कि आख़िर क्या मतलब निकालूं इस रिव्यू का।

जिस तरह मौसी की समझ में नहीं आया, कि वीरू को बसंती के लिए परफेक्ट दूल्हा समझें, या कोई आवारा और चोर-उच्चका। उसी तरह मेरे पल्ले ये नहीं पड़ा, कि ‘धूम-3’ को क्या समझूं- अच्छी फ़िल्म या बेकार फ़िल्म।

वो बसंती की मौसी थीं, कोई सौतेली मां नहीं। इसलिए जय के लाख समझाने के बाद भी मौसी ने वीरू का रिश्ता ठुकरा दिया, लेकिन बाद में वीरू की ज़िद के आगे मौसी को झुकना पड़ा, और वीरू के साथ बसंती का रिश्ता मंज़ूर कर लिया।

मौसी जैसी हालत रही मेरी और मेरे जैसे कई दर्शकों की, जो फ़िल्म देखने से पहले सेकंड ओपिनियन के लिए रिव्यूज़ पढ़ते हैं। ख़ैर, वो वीरू तो जैसे-तैसे टंकी से उतर गया, लेकिन ये वीरू (धूम-3) अभी भी टंकी पर चढ़ा हुआ है, और तब तक नहीं उतरेगा, जब तक कि मौसी (दर्शक) हां नहीं कहेंगी।

तो मौसियों मेरा मतलब है दर्शकों, वीरू को टंकी से उतारने के लिए थिएटर्स तक जाओ, और ख़ुद डिसाइड करना, कि वीरू से बसंती की शादी होनी चाहिए या नहीं। तब तक मैं ये समझने की कोशिश करता हूं, कि ये सारे जय (क्रिटिक्स) किसके साथ गहरी दोस्ती का फ़र्ज़ निभा रहे थे।

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