कोचादाइयां: दक्षिण भारतीय सिनेमा की एक और जंप

मुंबई: 2009 में जब जेम्स केमरून की फ़िल्म ‘अवतार’ रिलीज़ हुई थी, तो सिनेमा में जैसे एक नए युग का आग़ाज़ हुआ। केमरून ने अत्याधुनिक कंप्यूटर तकनीक के इस्तेमाल से पर्दे पर एक नई दुनिया रच दी थी, और ख़ुद भगवान  बन गए। लाइव और कंप्यूटर जेनरेटिड करेक्टर्स का ऐसा शानदार संगम पर्दे पर पहली बार देखा गया। ‘अवतार’ वाकई सिनेमा का नया अवतार था।

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आधे दशक बाद, दक्षिण भारत में ‘कोचादाइयां’ का अवतार उसी तकनीक से हुआ है, जिसका इस्तेमाल केमरून ने ‘अवतार’ के लिए किया था। परफॉर्मेंसेज केप्चर 3 D तकनीक के ज़रिए रजनीकांत की बेटी सौन्दर्या आर. अश्विन ने ‘कोचादाइयां’ को जीवंत किया है। फ़र्क इतना है, कि अवतार की तरह कोचादाइयां में लाइव करेक्टर्स नहीं हैं, उन पर आधारित सिर्फ़ एनीमेटिड करेक्टर्स हैं।

जेम्स केमरून को जहां ‘अवतार’ बनाने में सात साल लगे। वहीं, ‘कोचादाइयां’ डेढ़ साल में पूरी की गई है। हालांकि, ‘अवतार’ और ‘कोचादाइयां’ के बीच किसी भी तरह की तुलना बेमानी है, मगर फिर भी सौन्दर्या के साहस को सलाम करना होगा, जिन्होंने अपने डायरेक्टोरियल डेब्यू के लिए ऐसा विषय चुना।

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सौन्दर्या, रजनीकांत और ए आर रहमान।

सौन्दर्या ने एक बार फिर साबित कर दिया है, कि दक्षिण भारतीय फ़िल्ममेकर्स हिंदी सिनेमा के मुक़ाबले ज़्यादा रिस्क टेकिंग हैं। शंकर डायरेक्टिड ‘रोबोट’ (एंधीरन) हो, या एसएस राजामौली डायरेक्टिड ‘मक्खी’ (ईगा) हो, दक्षिण भारतीय सिनेमा हमेशा विषय और तकनीक के साथ कुछ नयापन लेकर आता है।

जब भी हमें लगता है, कि फ़िल्म मेकिंग के हिसाब से हिंदी सिनेमा एक क़दम आगे बढ़ रहा है, दक्षिण भारतीय सिनेमा में कुछ ऐसा हो जाता है, जो हमें पीछे कर देता है। अनुभव सिन्हा की ‘रा.वन’ और राकेश रोशन की ‘कृष’ जैसी फ़िल्में हिंदी सिनेमा को तकनीकी उछाल तो देती हैं, लेकिन दक्षिण भारतीय सिनेमा के सामने वो नाकाफी लगता है। शायद यहां फ़िल्ममेकर्स को क्रिएटिव होने के साथ ज़्यादा डेयरडेविल होने की ज़रूरत है।

देखें कोचादाइयां का ट्रेलर-

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